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क्या भारत का इतिहास भारत (भारतीयता) के शत्रुओं ने लिखा है?


इसी प्रश्न का एक पहलु यह है-विश्वभर के विश्वविद्यालय जहाँ बड़े-बड़े इतिहासकार अधिकार जमाकर बैठे हैं, सहस्रों इतिहासकार वहाँ बैठे लाखों लोगों को इतिहास पढ़ाते हैं, क्या वे भारत के शत्रु हैं ? अथवा क्या वे बुद्धि के कोहलू हैं?

अंग्रेजी भाषा में एक पद है जिसका अर्थ है, या तो धूर्त हैं अथवा मूर्ख हैं?

मूर्ख इस दृष्टि से हैं कि प्रायः पढ़े-लिखे लोग एक कल्पना कर लेते हैं और अपनी कल्पना ठीक है, फिर उसके प्रमाण ढूँढ़ते फिरते हैं। जो भी प्रमाण ( ?) उन्हें मिलते हैं उनको जबरदस्ती अपनी कल्पना में सही उतारने की चेष्टा करते हैं। जैसे गोलाकार छिद्र में चौकोर टुकड़ा फिट करने का प्रयास किया जाता है।

True History of India

विद्वानों की कल्पना में यह बात आई कि मध्य एशिया से सभ्यता सारे विश्व में फैली। भारत में भी तथा योरुप में भी। अब लाख युक्ति उनको दें कि यह सभ्यता मूल में भारत से मध्य एशिया को गई और वहाँ से विश्व में फैली परन्तु ये बुद्धि के कोल्हू जो गोल सुराख बनाकर बैठे हैं, इस बात को मानने को तैयार नहीं कि उनके मस्तिष्क में जो गोल सुराख बना है वह उनकी भूल है।

एक विचित्र बात यह है कि वर्तमान सभ्यता में पले तथाकथित विद्वान क्यों इतना बिदक उठते हैं जब उन्हें यह बताने का प्रयास किया जाता है कि आदि सभ्यता वैदिक सभ्यता है तथा वेदों में सृष्टि सम्बन्धी तथा आध्यात्मिक ज्ञान भरा पड़ा है। कुछ भी, जो भारत के मूल की बात होगी वे मानने को तैयार नहीं होते ?

और तो और, भारत में पढ़े-लिखे (विद्वान) भी उनके पीछे हाँ जी – हाँ जी करते फिरते हैं। उनको भी भारतीयता से ऐसे ही चिढ़ हो गई है जैसे यूरोप वालों को।

भारत में अंग्रेजी शिक्षा के स्थापक मैकाले ने अपने पिता को एक पत्र में लिखा था कि जो भी व्यक्ति एक बार इस शिक्षा पद्धति से शिक्षित हो जाएगा वह अपनी सभ्यता, संस्कृति, मान्यताओं तथा धर्म पर आस्था नहीं रख सकता।

यह कहा जाता है कि जो जाति अपना इतिहास भूल जाती है, वह जन – समुदाय तो रहता है परन्तु दिशाहीन-सा। भारत की महानता, भारत के आध्यात्म ज्ञान में, भारतीयों के चरित्र-बल में, वेद उपनिषदादि दर्शन शास्त्रों में वर्णित ज्ञान के कारण है। इसी के के आधार पर हम कह सकते हैं कि 1000 वर्षों की गुलामी के बाद भी हम एक जीवित जाति हैं। परन्तु हमारे इतिहास को भ्रष्ट कर हमें अपनी परम्पराओं से दूर किया जा रहा है। और इसमें मुख्यतया संलग्न ये इतिहासकार ही हैं। हमारा इतिहास बदला जा रहा है। हमारा साहित्य मिथ्या आधारों पर रचा जा रहा है। परिणाम यह हो रहा है कि समाज में अनाचार, दुराचार, भ्रम, भ्रष्टाचार फैल रहा है और यह बढ़ता ही जा रहा है।

मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है सुख और शांति और आज उसके पास यही नहीं है। हर जीवन में दुख, अशांति, भय, संशय, अनिश्चितता भरी हुई हैं।

मैं प्रोजेक्ट www.gloriesofindia.in के माध्यम से के हर भारतीय के मन में स्वाभिमान और सम्मान भरना चाहता हूं

दिनेश रावत

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